2026-02-03 15:13:36
हमारे देश में नामकरण की परंपरा सदियों से चली आ रही है । हर व्यक्ति की पहचान नाम से ही होती है और नाम के द्वारा ही यश व ख्याति प्राप्त की जाती रही है । सनातन परंपरा के अनुसार व्यक्ति को तीन नामों से पुकारा जाता रहा है । एक नाम राशि नाम होता है जिसे ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रखा जाता है । दूसरा नाम कुछ लोग राशि नाम को नकारते हुए अपनी स्वेच्छा से पसंद का नाम रख लेते हैं । इस नाम को पुकारू नाम या बोलता नाम बताया गया है । जबकि तीसरा नाम छद्म नाम जिसे बालक या बालिका के आदत , व्यवहार या रंग-रूप , गुण -दोष को आधार मानकर पुकारा जाता है जैसे - भूरा मोटू ,पतलू, कालू, धोलू, पप्पू , टीनू , गुड्डू, लालू , चुन्नू , मुन्नू , चिंटू , भोंदू आदि । बड़े हो जाने पर अधिकतर के वही उपनाम बन जाते हैं । उपनाम की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है । उपनाम की महिमा का मंडन विद्वानों के द्वारा हर युग में किया गया है । जब से वेदों की रचना हुई । उसके बाद वेद पढ़ने वालों को उपनामों से पुकारा जाने लगा । एक वेद पढ़ने वाले को बेदी , दो वेद पढ़ने वाले को द्विवेदी, तीन वेद पढ़ने वाले को त्रिवेदी और चारों वेदों के ज्ञाता को चतुर्वेदी तथा सभी वेदों की ज्ञाता को मिश्र या मिश्रा उपनाम से पुकारा जाता था और वही उपनाम आज तक प्रचलित है । मुस्लिम काल में भी हिंदुओं और मुसलमानों के उपनाम हुआ करते थे । मुगल काल में हिंदुओं के टाइटल को लाला , सेठ मुंशी , दुबे , चौबे आदि नाम से पुकारा जाता था । मुस्लिम लोग अपने नाम के पीछे शाह , अली, अंसारी , खान, खां, मोहम्मद आदि उपनाम लगाते रहे हैं । अधिकतर लोगों ने अपने नाम के पीछे अपनी जातियों और गौत्र के नामों को उपनाम के तौर पर इस्तेमाल किया जैसे - यादव, जादव , जाधव, राजपूत, मीणा , जाट , ठाकुर, पंडित , गुर्जर , जोगी , योगी , सेन, जांगिड़ , प्रजापति, पासी , बच्चन , श्रीवास्तव, सक्सेना, जायसवाल, माथुर आदि । अंग्रेजी राज में भी कितने लोगों को अंग्रेजी सरकार द्वारा दी गई उपाधियों को भी उपनाम के तौर पर इस्तेमाल किया गया जैसे - राय, राव , राय बहादुर, सर , राजा, नवाब , सरदार , प्रधान , नंबरदार , जमींदार, जेलदार आदि । आजादी के बाद भी ये टाइटल नाम आज तक प्रचलित है । पश्चिमी बंगाल में मुखर्जी , चटर्जी , बनर्जी, चट्टोपाध्याय , उपाध्याय, बंद्योपाध्याय आदि उपनाम सुने जाते रहे हैं । विशेष तौर से विद्वान, साहित्यकार, वैज्ञानिक , कलाकार आदि की पहचान उनके अपने नाम के पीछे उपनाम जोड़ने से ही है ।
हिंदी भाषी प्रदेशों में उपनाम सर्वाधिक प्रचलित रहे हैं जैसे - शर्मा , वर्मा , सिंह, प्रसाद, पाठक, पंडित, मिश्रा, तिवारी, शास्त्री, शुक्ला , ओझा , झा, जोशी, पासवान, ठाकुर , पासी, राणा , राठौड़ , राजपूत , चौहान , चौधरी, बिष्ट , सिन्हा, मोदी, कौशिक, भारद्वाज, शांडिल्य, गौड़ , पांडेय, मारवाड़ी आदि । दक्षिण भारत में उपनाम की परंपरा बहुत कम नजर आती है किसी-किसी स्थान पर रेड्डी , राव , राय , कृष्णन , गिरी , अय्यर, नय्यर , प्रधान जैसे उपनामों को सुना जा सकता है । साधु -संतों , ऋषि - मुनियों में भी उपनाम की परंपरा पंथ के अनुसार रही है जैसे - मठाधीश , मंडलेश्वर , महामंडलेश्वर, शंकराचार्य , जगतगुरु, आचार्य आदि ।
उपनाम रखने की परंपरा कवियों , कवयित्रियों और साहित्यकारों में सर्वाधिक प्रचलित है जैसे - राही, राज , पथिक , मुस्कान , आर्य, निराला, निर्मल , मधुर , मधुल , एकलव्य, दुलारा, प्यासा , अकेला , अंबर , अलबेला , उजाला , उत्सुक , आवारा, आशिक, अंचल, चंचल , गुलेरी, फूल , चंपक, कौशल, मिस्त्री, पंत , स्नेही, त्रिशूल, तरंगी, सुमन , रेणु, दिनकर, पवन , नमन , भाटी, सरगम , विनम्र, साथी, मनोज, नर कंकाल, देसी घी, बैरागी , चारण , शर्मा , वर्मा , भास्कर , बहार, बुलंदी , दीप , रंगीला आदि देखे जा सकते हैं ।पढ़े लिखे विद्वानों और साहित्यकारों के उपनाम भी हास्य के तौर पर - अज्ञेय , अज्ञानी , अनपढ़, भुलक्कड़, भोंपू, लाट , लठ्ठ, बेचैन, धूमिल आदि भी उपनाम से ख्याति प्राप्त करते रहे हैं । देशभक्त की भावना रखने वाले ओज कवियों या बहादुर व्यक्तियों के उपनाम भी इस प्रकार हैं - निर्भीक, अनल , अंगार , वीर, निर्दोष , निडर , जोशीला , अग्रवंशी, क्षत्रिय, उग्र, देशप्रेमी, चक्रवर्ती , हिंदुस्तानी , स्वदेशी , आग , भारती आदि ।कुछ लोग अपने शहरों व गांवों के नाम के द्वारा भी जाने जाते रहे हैं जैसे - बलरामपुरी , कानपुरी, जयपुरी, फतेहपुरी , बेनीपुरी, हरियाणवी, मारवाड़ी , राजस्थानी , बीकानेरी, इंदौरी , बनारसी, मेरठी, भोपाली, लुधियानवी, लखनवी, मुरादाबादी , इलाहाबादी, हाथरसी, नेपाली आदि -आदि । कई उच्च घरानों के लाडले , रईस लोग, प्रशासनिक अधिकारी आदि भी अपने उपनाम से जाने जाते रहे हैं । इसीलिए ऐसा कहा जाता रहा है - यथा नाम तथा गुण ।
- डॉ. त्रिलोक चंद फतेहपुरी
अटेली, हरियाणा।